Dussehra 2026

Dussehra / Vijayadashami 2026

Date, Muhurat & Puja Vidhi

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विजयादशमी (दशहरा) – पर्व, नियम और पूजा विधि

दशहरा या विजयादशमी का पावन पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को, अपराह्र काल में मनाया जाता है। यह त्योहार बुरााई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, क्योंकि इसी शुभ दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। कई स्थानों पर इसे माता विजया से जुड़े होने के कारण ‘विजयादशमी’ और कुछ जगह ‘आयुध पूजा’ भी कहा जाता है।

विजयादशमी (दशहरा) – पर्व, नियम और पूजा विधि
दशहरा या विजयादशमी का पावन पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को, अपराह्र काल में मनाया जाता है। यह त्योहार बुरााई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, क्योंकि इसी शुभ दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। कई स्थानों पर इसे माता विजया से जुड़े होने के कारण ‘विजयादशमी’ और कुछ जगह ‘आयुध पूजा’ भी कहा जाता है।

मुहुर्त के मुख्य नियम
दशहरा मनाने की तिथि तय करने के लिए कुछ खास नियम माने जाते हैं:

अपराह्र काल: यह समय सूर्योदय के बाद 10वें मुहुर्त से शुरू होकर 12वें मुहुर्त से ठीक पहले तक रहता है। इसी काल में दशमी तिथि का होना जरूरी है।

यदि दशमी तिथि दो दिन हो और अपराह्र काल केवल दूसरे दिन पड़े, तो दशहरा दूसरे दिन ही मनाया जाएगा।

यदि दोनों दिन के अपराह्र काल में दशमी हो, तो यह पर्व पहले दिन मनाया जाएगा।

यदि दशमी दोनों दिन हो लेकिन किसी भी दिन के अपराह्र काल में न पड़े, तब भी त्योहार पहले दिन ही मनाया जाएगा।

श्रवण नक्षत्र का प्रभाव:

यदि दोनों दिन दशमी हो और श्रवण नक्षत्र केवल पहले दिन के अपराह्र काल में हो, तो विजयदशमी पहले दिन मनाई जाएगी।

यदि श्रवण नक्षत्र केवल दूसरे दिन के अपराह्र काल में मिले, तो उत्सव दूसरे दिन मनाया जाएगा।

अगर दशमी दो दिन हो, अपराह्र काल केवल पहले दिन पड़े, दशमी दूसरे दिन के पहले 3 मुहुर्त तक रहे और दूसरे दिन के अपराह्र काल में श्रवण नक्षत्र हो, तो दशहरा दूसरे दिन मनाया जाएगा।

यदि दशमी पहले दिन के अपराह्र से लेकर दूसरे दिन के 3 मुहुर्त से भी कम समय तक रहे, तो बाकी सभी नक्षत्र नियमों को दरकिनार करके पहले दिन ही विजयादशमी मनाई जाएगी।

अपराजिता पूजा और विधि
अपराह्र काल में अपराजिता देवी की पूजा की जाती है, जिसकी पूरी प्रक्रिया नीचे दी गई है:

स्थान का चयन: घर की उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में किसी पवित्र स्थान (जैसे मंदिर या बगीचा) को चुनें। इसमें पूरा परिवार शामिल हो तो अति उत्तम है, वरना अकेले भी पूजा की जा सकती है।

आसन तैयार करना: उस जगह को साफ करके चंदन के लेटे से ‘अष्टदल चक्र’ (8 कमल पंखुड़ियों वाला चक्र) बनाएं।

संकल्प: अपने और अपने परिवार की भलाई के लिए मां अपराजिता की पूजा का संकल्प लें।

आवाहन: चक्र के बीच में “अपराजिताय नमः” मंत्र से मां अपराजिता का आह्वान करें।

दाएं और बाएं: उनके दाएं ओर “क्रियाशक्त्यै नमः” बोलकर मां जया का और बाएं ओर “उमायै नमः” बोलकर मां विजया का आह्वान करें।

षोडशोपचार पूजा: इसके बाद तीनों देवियों के नाम मंत्रों के साथ पूजा संपन्न करें।

प्रार्थना और विसर्जन: देवी से कहें कि मैंने अपनी क्षमता के अनुसार पूजा की है, कृपया इसे स्वीकार करें। इसके बाद नमस्कार करें और इस मंत्र के साथ विसर्जन करें:

“हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।”

अन्य महत्वपूर्ण पूजा और परंपराएं
विजय मुहूर्त: सूर्यास्त के बाद जब कुछ तारे दिखने लगते हैं, उसे विजय मुहूर्त कहते हैं। इस समय किसी भी नए कार्य की शुरुआत करने पर सफलता मिलती है। भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई इसी मुहूर्त में शुरू की थी। इसी समय शमी के पेड़ ने अर्जुन के गांडीव धनुष की रक्षा की थी।

साढ़े तीन मुहूर्त: दशहरा साल के सबसे शुभ ‘साढ़े तीन मुहूर्तों’ में से एक है। इस पूरे दिन कोई भी नया काम शुरू किया जा सकता है।

विभिन्न समुदायों की पूजा:

क्षत्रिय और योद्धा अपने हथियारों की पूजा करते हैं (आयुध पूजा) और शमी पूजन करते हैं।

ब्राह्मण माता सरस्वती की पूजा करते हैं।

वैश्य वर्ग अपने बही-खातों की पूजा करता है।

अन्य उत्सव: इस दिन जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं, नवरात्रि और रामलीला का समापन होता है, और बंगाल में दुर्गा पूजा पूरी होती है। इस दिन ‘अपराजिता स्तोत्र’ का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है।

पौराणिक कथाएं
रावण वध: भगवान राम द्वारा दस सिर वाले रावण के वध की याद में यह पर्व मनाया जाता है। रावण के दस सिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या, स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता और अहंकार के प्रतीक हैं, जिन्हें पुतले दहन के जरिए जलाया जाता है।

पांडवों का अज्ञातवास: महाभारत काल में जुए में हारने के बाद पांडवों को 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास मिला था। अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष शमी के पेड़ पर छुपाया था और बृहन्नला के रूप में राजा विराट के यहाँ रहे थे। बाद में गायों की रक्षा के लिए उन्होंने शमी के पेड़ से ही अपना धनुष वापस निकाला था।

अगर इस त्योहार का असली आनंद लेना है, तो मैसूर का दशहरा देखने जरूर जाएं। इसके बाद से ही घरों में दीवाली की तैयारियां जोरों-शोरों से शुरू हो जाती हैं। आपको दशहरे की ढेरों शुभकामनाएं!